फिलहाल हम झगड़ रहे हैं
मकान के लिए, दुकान के लिए।
धर्म के लिए, ना इमान के लिए।
क्या कभी ऐसा होगा?
पानी की इक बूंद के लिए हम आपस में कुश्ती लड़ेंगे,
अपनी एक-एक श्वास के लिए औरों की श्वास की परवाह ना करेंगे?
हम तब सही लड़ रहे होंगे या अब सही लड़ रहे हैं।
हो सकता है तब हम अपनी प्यास बुझाने के लिए टेक्नोलॉजी को ही पी जाए,
ऊंची इमारतों को खाने लगे
और श्वासॊं का विकल्प भी ढूंढ लें।
हमें पर्यावरण की गतिविधियां वैसे भी समझ कहां आती हैं?
कभी बारिश, कभी छांव, तो कभी धूप हो जाती है।
क्या पर्यावरण भी इन्हें एक दिन अपना लेगी?
क्या यह ए.सी. की हवा इन्हें भी ठंडक पहुंचाएंगी या फिर ऊंची इमारतें इनकी पर्यटन स्थल बन जाएंगी। या फिर यह पॉलीथिन खाकर अपनी भूख मिटाएगी?
क्या कभी, हमें अपने परिवार के साथ रहता देख, इन्हें भी अपने परिवार की याद आएगी?

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