कली

चित्र स्त्रोत: पिंटरेस्ट

ग्रामीण परिवेश में रहने वाली कली को घूमने फिरने का बहुत शौक था  , फिर भले ही वह पास की दुकान में लेमचूस लाने जाना ही क्यों ना हो। उसका बस चलता तो वह साल के ३६५ दिन घर से बाहर ही रहती। 

हमेशा मां की गोद से चिपकी ,कली उन्हें भर-भर के मक्खन लगाती , "मां तुम कितनी अच्छी हो , तुम कितनी सुंदर हो , कितना ख्याल रखती हो मेरा।"

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मां सोचती की प्यारी बिटिया कितना स्नेह करती है मुझसे। किंतु असल में कुछ और ही खिचड़ी पक रही होती थी कली के खुराफाती दिमाग में। धीरे-धीरे मां को समझ आने लगा था कि जब कभी उन्हें यात्रा के लिए निकलना होता

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 ठीक उसके कुछ दिन पहले से ही बिटिया मां की भर-भर के तारीफ करती।

एकदम थोक में।




"मां मुझे भी साथ ले चलो" , कली ने कहा , जब उसे पता चला कि मां आज पिंटू मौसी के घर जा रही है। 

मां ने कहा , "नही बिटिया , आज नहीं , मैं संध्या होने से पहले आ ही जाऊंगी। "।

" तुम कितनी भोली हो , तुम कितनी प्यारी हो मां, मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नही रह सकती , मुझे भी अपने साथ ले चलो मां।" कली ने गिड़गिड़ाते हुए कहा। 

मां ने साफ़ साफ़ इनकार कर दिया उसे ले जाने से। फिर क्या था कली दहाड़े मार-मार के रोने लगी।

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इस बार उसके मायाजाल में मां नही फंसी। कली को रोता देख उसके दादाजी निराश हो गए। वह आज शाम देर से भ्रमण कर लौटे। 
"बिटिया कल से तुम रोज घूमने जाओगी।"आते ही कली को उन्होंने आवाज लगाई और यह कहा । यह सुनते ही कली खुश हो गई।

"परी बिटिया कल से गांव के विद्यालय जाएगी , मैंने हेडमास्टर साहब से बात कर ली है।" , दादाजी ने कहा।

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कली को स्कूल के बारे में ज्यादा कुछ तो नहीं पता था बस इतना कि वहां पर उसे पढ़ाई करनी होगी , थोड़े बहुत खेलकूद भी होंगे और उसकी शिक्षिका उसे भर-भर के गृह कार्य देगी किंतु फिर भी यह सोच कि उसे रोज कहीं बाहर जाने मिलेगा , वह खुश थी।

अब वह प्रतिदिन विद्यालय जाने लगी और खूब मन लगाकर पढ़ाई करती। मां अगर पूछती कि बिटिया चाची से मिलना चलेगी? तो वह साफ मना कर देती। अब भला कली कुछ करें और उसके पीछे कोई उद्देश्य ना छुपा हो , ऐसा ना कभी हुआ और शायद ही कभी होगा। उन दिनों वह दिन रात आंगन में तोते की तरह अपनी पाठ्यपुस्तक रटती रहती थी। परीक्षााके  दिन वह काफी खुश थी और घर लौटकर चार रोटियां खाई थी उसने , रोज से दो ज्यादा। 

दिन यूं ही बीतता चला गया और परीक्षा परिणाम वाला दिन भी आ गया। उस दिन कली खूब रोई। 

 "इतने अंक अच्छे आने पर भी रो रही है?"दादा जी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए हुए पूछा । कली और जोर से रोने लगी।

 "दादा जी मुझे प्रथम आना था मैंने इसके लिए दिन रात एक कर दी थी। मुझे भी बाकी बच्चों की तरह अपनी मां को मेडल और पुरस्कार में मिले किताब दिखाना है जो हर साल स्कूल में अव्वल आने वाले को मिलता है।"

"मेरी नन्ही गुड़िया , यदि तुम अपने पाठ्यक्रम को समझकर अभ्यास करोगी बजाय उसे रटने के तो आज नहीं तो कल अवश्य तुम अव्वल आओगी। मेहनत करती रह बिटिया।" , दादा जी ने कहा।

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कली ने अब समझ कर पढ़ाई करनी शुरू कर दी। चौथी कक्षा में उसे तीसरी कक्षा के मुकाबले ज्यादा अच्छे अंक मिले। उसे यकीन था कि वह पांचवी में यकीनन अव्वल आएगी और घर आकर मेडल सबसे पहले अपनी मां के गले में पहनाएगी।

पांचवी कक्षा का परिणाम वाला दिन भी आ गया और कली दहाड़े मार के रो रही थी। 

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 "अब क्या हुआ बुद्धू लड़की ? इस बार तुम तो अव्वल आई हो , फिर क्यों मोती बहा रही?" ,दादा जी ने आश्चर्य होते हुए पूछा।

"प्रधानाध्यापक ने इस बार विद्यालय के मंच से ऐलान किया है कि इस साल से अव्वल विद्यार्थियों को सम्मानित नहीं किया जाएगा क्योंकि इससे दूसरे बच्चों के अंदर हीन भावना पैदा होती है और उनका मनोबल भी कम होता है। सारे बच्चे एक समान है हमारे लिए।" क्यों दादा जी , क्यों? इस प्रधानाध्यापक की मुझ से क्या दुश्मनी है? अब मैं नहीं पढ़ूंगी , मुझे अव्वल भी नहीं आना कभी। मेरा भी मन था कि मैं अपनी मां को मेडल दिखाऊं , मेरी मेहनत बेकार दादाजी" , और यह कह कली रोते-रोते वहां से चली गई।

अब कली सिर्फ उतना ही पढ़ती जिससे कि उसे अव्वल ना आ जाए। ऐसा करते करते उसने दसवीं पास कर ली। उसे दसवीं में काफी अच्छे अंक आए लेकिन वह प्रथम नही आई और वह ऐसा चाहती भी थी।

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कली के माता-पिता ने यह निर्णय लिया कि बिटिया पढ़ने में अच्छी है तो उसे शहर के किसी उच्चतम कोचिंग में दाखिला करवाएंगे। उसे किसी भी चीज की कमी नहीं होने देंगे।

अगले ही दिन बोरिया बिस्तर समेट ,अपनी प्यारी-सी बिटिया को लेकर वह शहर आ गए और उसका दाखिला शहर के बेहतरीन कोचिंग संस्थान में करा दिया। 

कली जब पढ़ने जाती तो उसे ऐसा लगता कि वह सबसे भिन्न है‌। उसके सहपाठी फराटेदार अंग्रेजी में बात करते , और कली की इस भाषा में पकड़ थोड़ी तंग थी। जहां सारी लड़कियां तरह-तरह के पोशाक पहनती , वहीं कली गुलाबी सलवार कमीज़ तो कभी हरी साड़ी पहन पढ़ने जाया करती। उसकी मां उसे घर से खाना बांध देती और बाकी सारे बच्चे कैंटीन में खाते। लेकिन कली ने कभी अपनी मां से जिद नही की , ना ही किसी चीज की शिकायत ही , क्योंकि उसे अपने घर की स्थिति ज्ञात थी , अपने मां-बाप के त्याग का एहसास भी था।  

अब कली ने पढ़ना जोर-शोर से शुरू कर दिया। भई! वकालत की पढ़ाई में मेहनत तो लगती ही है।अब भला कली कुछ करें और उसके पीछे कोई उद्देश्य ना छुपा हो ऐसा ना कभी हुआ था और शायद ही कभी होगा।

उसने अपने सर को (शहर के मास्टर जी को सर की उपाधि देते हैं विद्यार्थी) यह कहते सुना था कि हर साल की तरह इस सालभी जो बच्चा बारहवीं में प्रथम आएगा उसे मेडल और किताब दे कर सम्मानित किया जाएगा , और हमारे संस्थान के बच्चे कहां ही किसी प्रतियोगी परीक्षा में भाग लेते हैं , जो अब लेंगे।

यह सुन कली की अधूरी इच्छा ने उफान मारना शुरू कर दिया। इस दूसरे मौके को वह किसी भी हाल में गंवाना नही चाहती थी। जिस तरह अर्जुन की नजर मछली की आंख पर थी ठीक उसी तरह कली की नजर उस मेडल पर। 

धीरे-धीरे समय बीतता चला गया और बारहवीं कक्षा का परिणाम आ गया। आज परी दुखी नहीं थी , बस चुप थी

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क्योंकि आज वह बारहवीं में अव्वल आई थी लेकिन पुरस्कार उसे नहीं बल्कि वकालत की परीक्षा में पूरे देश में अव्वल आने वाले विद्यार्थियों को मिल रहा था। परी ने तो ऐसे किसी भी परीक्षा का फॉर्म ही नहीं भरा था। अब उसने मेडल पाने की इच्छा को अपने दिमाग से हमेशा के लिए निकाल दिया यह सोच कि मेडल पाना उसके किस्मत में ही नहीं है और उसने स्नातकोत्तर में दाखिला ले लिया। 

अब उसे ना मेडल चाहिए था , ना ही कोई और पुरस्कार। वह बस अपनी पढ़ाई करती और वह स्नातकोत्तर पास कर ले , यही उसके लिए अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि होती।

कली जो हमेशा अव्वल आने का ख्वाब देखा करती थी , वह अब स्नातकोत्तर पास भर कर ले , इस बात से ही संतुष्ट है।

 मां सबको मिठाईयां खिला रही है , तरह-तरह के लजीज पकवान भी बना रही है। 

 "क्यों बहन जी? आज कुछ विशेष है क्या घर में? बिटिया का जन्मदिन वनमदीन है क्या? " , पड़ोसी ने पूछा। 

मां ने गले में झूल रहे मेडल को दिखाते हुए कहा गर्व से कहा , "आज मेरी बिटिया का स्नातकोत्तर का परिणाम आया है‌। मेरी कली ऐसे वैसे पास नहीं हुई है , अव्वल आई है अव्वल। और सम्मानित भी किया गया है उसे मंच पर।


चित्र स्रोत: पिंटरेस्ट
आखिरकार , कली का विद्यालय और फिर कोचिंग में देखा हुआ सपना , कॉलेज में आकर पूरा हो ही गया तब जब उसने इसकी उम्मीद पूर्ण रूप से छोड़ ही दी थी लेकिन मेहनत में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।



सच ही है ," तू बस मेहनत कर , फल की चिंता ना कर , जो तेरा होवेगा , वह तुझे जरूर मिलेगा , देर या सवेर।"


#कलीकीखिलनेकीकहानी

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