बचपन
बच्चे कितने मासूम होते हैं ना।?
कितनी सरलता से अपनी सारी भावनाएं बेझिझक बयां कर देते ,
यह सोचे बिना कि सामने वाला कौन है ।
उन्हें तो मानो जैसी पूरी दुनिया ही अपनी सी लगती है।।
किसी के साथ भी
खिलखिला कर हंस लिया ,
छोटी सी बात पर रो दिया ,
पल भर में गुस्सा ,
अगले ही पल प्यार ,
ऐसा ही तो होता है बचपन।
वो कहते हैं ना कि बचपन कोई भुलाए नहीं भूलता ,
और यह ख्याल सबके ज़हन में एक बार तो जरूर ही आता
कि काश हम फिर से बच्चे बन जाते।
बचपन में कहां ही कोई मुखौटे थे !?
ना हीं *बी रियल* कहने की कोई जरूरत ही थी ,
क्योंकि सब रियल ही तो थे ,
अपनी धुन में मस्त।
बड़ा होना मतलब जिम्मेदार होना ,
यही सोचते हैं ना हम।?
समझदारी ज़रूरी है ,
जिम्मेदारी ज़रूरी है ,
लेकिन इस सब के दरमियां आपकी मासूमियत भी ज़रूरी है।
क्योंकि इतनी समझदारी किस काम की!?
जो आपसे आपका वजूद ,
यानि कि आपका बचपन ही छीन ले।
खिल खिलाइए ,
मुस्कुराइए ,
गुस्सा भी दिखाइए ,
बेशुमार प्यार भी जताइए
फिर से बच्चे बन जाइए।
PS keep the child within you alive and kickin :)
#बचपन

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